Tuesday, September 9, 2008

हम मुम्बईकर...

पंछी नदीयाँ पवन के झोंके ... कोई सरहद ना इन्हें रोके... सरहदें इन्सानों के लिए है ...सोचो तुमने और मैने क्या पाया इन्साँ होकें... जगजितजी कि गायी हुई यह गज़ल हमें मज़बूर करती है सोचने पर... क्या इन्सान होकें हम खुश है ? इन्सान होके जो हमने पाया है ...क्या वह उतने महत्त्वपूर्ण है हमारे जीवन में ?? क्या कागज़ के चंद तुकडे या कागज़ पे बनाई हुई एक लकिर हमारे लिए सचमुच इतने माइने ऱखते है? यदि नहि तो हम क्यों बन्धे हुए है इस लकिरों में? इन सवालों के जवाँब वैसे तो मिल नहि सकते... पर फिर भी हमारे पासही उनका जवाँब है! हम इतने सालों से अपने जहँम में छूपाएँ है । और फिर भी उसी आँग मे जल रहे है ... उस चंद लकीरों को अपना खुदा मानकर चल रहे है ... और धीरे धीरे वह लकीरे हमारे मन में भी अपनी जगह ले रही है। कहने की बाँत यह नहि है की यह लकीरें जिंदा है ; पर वे जिंदा है हमारे 'मन' में । कभी देश...कभी राज्य ...कभी धर्म ...कभी जाती के रूप में भले हि यह लकीरें कागज़ पे ना हो पर हमारे मन में है। इन्हे दूर करने की जिम्मेवारी भी हमारी है! कल मुम्बई में जो विस्फोटोंका सिलसिला हुआ , वह इसी लकिरोंकी परिणीति है। हम हिंदु है या मुसलमान...गरिब या मालदार ... आनेवाले संकट तो यह नहि देखते है ना? हमें अपने मन कि यह लकिरें मिटाकर...किसी के खलभावना में ना फस कर ...एक दुसरेको सच्चे मन से मदत करनी चाहिये ...यहि आप सबसे गुजारिश है।

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